शनिवार, 9 जनवरी 2016

लघुकथा

बेचारे
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     काम बालियां अधिकतर सेवा परायण नहीं होती ।लेकिन वह थी। पूरे वृद्धाश्रम में झाडू पोछा उसका काम था। एक दिन उसने दया से पनीले हो आये स्वर को संयत करके बेचारे वृद्ध से पूछा" बाबा आप यहां कैसे आये?"
मुंह मे भरी सुरती फच्च से कमरे के कोने में थूकते हुये बोले
"अरे !!कैसे, क्या?? लडका बच्चा जब देखो चें चें चें चें ।इधर न सुरती थूको ।उधर न थूको। 'हस्स ससुर '"अपनो घर थूकनौ को डर " छोड़ दिया घर ,चले आये हिआं।"
वह मुंह बाये अभी-अभी साफ किये फर्श पर पडी सुरती की पिचकारी को देखती कभी ' बेचारे वृद्ध 'को।
डाॅ सन्ध्या तिवारी

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