शनिवार, 9 जनवरी 2016

लघुकथा

तंज
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मुझे डी. एम. बने कुछ ही महीने हुये थे।
कर्तव्य जोश से भरी मैं एक दिन अपने अधीनस्थ एक गाँव के सरकारी स्कूल में औचक निरीक्षण को जा पहुँची।
सारा स्कूली अमला सकते मे आ गया ।
"मिड डे मील चेक करो"  मैने आदेशात्मक स्वर में अर्दली से कहा।
अर्दली तुरंत मध्यांतर भोजन चेक करने लगा -
" दाल इतनी पतली क्यों है ? और हरी सब्जी बनी कि नही ? बच्चो को कुछ पौष्टिक मिल भी रहा है कि नहीं ?"  मैंने घूर कर प्रधानाध्यापिका से कहा-

वह कुछ सहम सी गईं,  बोलीं कुछ नहीं।

मैंने कक्षा में जाकर बच्चों से कुछ प्रश्न पूछे उनका उत्तर भी नहीं मिला ।मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था ।
मैने पुनःप्रधानाध्यापिका से कहा ; " क्या है मैडम ये सब ? ऐंऽ  ! कोई नाक बहा रहा है? कोई पेंसिल चबा रहा है ?  साफ सफाई का कोई ध्यान नहीं। किसी को कुछ भी आता जाता नहीं ।और ये सब ठाठ फट्टी पर क्यों बैठे हैं कोई कुर्सी मेज का कायदा  है कि नहीं ।ये स्कूल है या बूचड खाना? सरकार की तरफ से कितनी सहायता मिलती है इन स्कूलो को? फिर भी ऐसी दुर्गति।और क्या किया जाये, इन स्कूलों की दशा सुधारने को ?

"काश आप जैसे बडे घरो के  बच्चे यहाँ पढ़ते तो इन स्कूलो को दिशा मिल जाती।"

       कहीं से फुसफुसाहट उभरी ।

डाॅ संध्या तिवारी

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