रानी बिटिया
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"चटाक " उसके नन्हे से गाल पर पांचो उंगलियों के निशान छप गये थे ।
" तोड दिया तूने इत्ता बडा शीशा । घर में असगुन फैलाती रहती है । अपनी मां को तो खा गई ।अब न जाने किसको खायेगी।
ले अब देख इस टूटे शीशे मे अपनी रोनी सूरत।
देखती हूं, कौन लाकर देता है तूझे नया शीशा ?
"न बेटा! टूटे आइने में मुंह नही देखते, उमर कम होती है ।मैं तेरे पापा से आज ही नया शीशा मंगा दूंगी ।बहुत शौक है न मेरी गुडिया रानी को सजने का ।ऊं ऊं मेली लानी बिटिया।"
मां की कोमल उंगलियों ने ठुड्डी को पकड के हिला दिया था।
रचना का अतीत वर्तमान पर हाबी हो जाता जब जब वह टूटे आइने मे खुद को देखती तो सोचती आज शायद यह मेरा आखरी दिन होगा, क्योकि मां ने कहा था ; "टूटा आइना देखने से उम्र कम होती है। " मैं तो इतने सालों से टूटा आइना देख रही हूं।
दिल की कराह आंखो के रास्ते बह निकलती।
रचना तैयार हो जाओ बरात आती ही होगी
रिश्ते की भाभी ने हाथ पकड कर उसे ड्रेसिंग टेवल के सामने लाकर खडा कर दिया।
रचना अंदर तक कांप गई
मुस्कुराती हुई मां ने शीशे में से पुकारा ; " मेरी रानी बिटिया अब कभी टूटा शीशा मत देखना उमर कम होती है।"
रचना शीशे को सीने से चिपकाये फूट फूट कर रोते हुये बोली ; " मां तुमने झूठ क्यों कहा मेरी उमर तो कहीं कम नहीं हुई।रत्ती भर भी नहीं।"
डाॅ सन्ध्या तिवारी
शनिवार, 9 जनवरी 2016
लघुकथा
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