गुरुवार, 7 जनवरी 2016

लघुकथा :चिमटी

चिमटी
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         आत्मा पर बडा बोझ था , जो रातों में सपना बन कर डराता था और दिन में सोच ।
         अब क्या करूं , मैं तो था ही कायर, लेकिन वह तो समझदार थी, उसे अपनी जान देने की क्या जरूरत थी।वह मरकर मुक्त हो सकी भला क्या? और मै जीकर भी मुक्त हो पाया भला क्या उसकी यादों से। क्या करूं? कहां जाऊं ?कैसे इस अपराध बोध से मुक्ति होगी ?
    इन्ही बातो की सोच में डूबता उतराता विपुल बान की खरखटी खटिया पर बैठा  कभी एक छेद मे हाथ डालता कभी अदबाइन के सहारे सहारे अंगुलियां किसी और छेद में जा ठहरती ।जैसे सोच के कई खाने बने हो और उनमें से किस खाने में ग्लानि की भरपाई का मल्हम मिलेगा  अंगुलिया टोहकर ढूंढ़ना चाह रही हों।   "आऊच... " कह कर उसने हाथ खींच लिया बान की फांस अंगुली के मांस में धंस चुकी थी ।वह नाखूनो की चिमटी बना कर फांस निकालने का भरसक प्रयत्न कर रहा था लेकिन फांस थी कि अन्दर ही अन्दर टूटती जा रही थी ।फांस मांस मे धंस चुकी थी  बहुत दर्द और चीसन बढ गयी थी। अब तो इसके लिये बाजार से चिमटी ही लानी पडेगी तब  कही जाकर...
कहकर विपुल तर्पण के लिये जल , काले तिल , जौ , फूल की थाली , कुश की पैंती और सफेद फूल अंजुली में भर कर बैठा।
" आप पिछले कई सालो से किसका तर्पण कर रहे है भगवान की कृपा से मां बाऊ जी सभी कुशल मंगल से है, तो...?"
पत्नी जिज्ञासा और प्रश्न चिन्ह की प्रतिमूर्ति सी बनी खडी थी।
विपुल अपनी फांस लगी अंगुली की चीसन दबाते हुये बोला ; " तर्पण कहां है यह , यह तो मन की फांस की चिमटी है , और अंजुली भरे पानी में दो आंसु  टपक गये।
डाॅ सन्ध्या तिवारी

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